उम्र की ऐसी की तैसी... ! शब्द दिलीप कालभोर जी के कलम से

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उम्र की ऐसी की तैसी... ! ( How on Earth does YOUR SUMMERS PAST( their number) play spoilsport with your gritty resolve to lead a life full of evalengical fervour, trademark mirth and disarming cheerfulness??....

उम्र की ऐसी की तैसी... !

( How on Earth does YOUR SUMMERS PAST( their number)
play spoilsport with your gritty  resolve to lead a life full of evalengical fervour, trademark mirth and disarming cheerfulness??....

घर चाहे कैसा भी हो..
उसके एक कोने में..
खुलकर हंसने की जगह रखना..
सूरज कितना भी दूर हो..
उसको घर के भीतर आने का रास्ता देना..
कभी कभी छत पर चढ़कर..
तारे अवश्य गिनना..
हो सके तो हाथ बढ़ा कर..
चाँद को छूने की कोशिश करना .
अगर हो लोगों से मिलना जुलना..
तो घर के पास पड़ोस से नज़दीकी ज़रूर बनाए रखना..
 बारिश की भीग का मज़ा लेना,..
उछल कूद भी करते रहना, पैदल चलना... सबेरे और सांझ .
हो सके तो बच्चों को..
एक कागज़ की कश्ती चलाने देना....
कुदरत की सौगात का इल्म रखते हुए कभी कभी नदी,नाले,पहाड़,खाइयां,घाटियां , शैल शिखर, बियाबान में टहलकदमी करना,
कभी हो फुरसत और आसमान भी  हो साफ,
तो एक पतंग आसमान में उड़ाना,..
हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना ज़ऱूर .
घर के सामने रखना एक पेड़..
उस पर बैठे पक्षियों की बातें ध्यान लगाकर  सुनना..
घर चाहे कैसा भी हो.. 
घर के एक कोने में..
खुलकर हँसने की जगह रखना.
चाहे जिधर से गुज़रिये
मीठी सी हलचल मचा दीजिये,
उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है
अपनी उम्र का मज़ा लीजिये.
ज़िंदादिल रहिए जनाब,
 ये चेहरे पे उदासी कैसी
वक्त तो बीत ही रहा है,पल दर पल 
 उम्र की ऐसी की तैसी...!!
✍ DBK

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