300 वर्ष: राजा भोज के समय की बलका नदी बन गई बघार नाला

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300 वर्ष: राजा भोज के समय की बलका नदी बन गई बघार नाला

समय व इतिहास के पन्नों से एक और रहस्योदघाटन हुआ। वर्तमान में जहां बघार नाला बह रहा है वह किसी समय बलका नदी के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में समय बदलते उसे बघार नाले का नाम दिया गया। प्रमाण के तौर पर बलका मंदिर आज भी बघार भोजपुर के निकट स्थित है।

दरअसल बलका नदी और बलका मंदिर कहीं न कहीं से भोजपुर के राजा भोज से जुड़ा हुआ है। किवदंती को अगर मानें तो गंगुआ तेली और राजा भोज के बीच स्वाभिमान की लडाई छिड़ी हुई थी। एक धोबी जो राजा भोज और गंगुआ तेली के ही कपड़े धोता था, धोबी से धोखे में गंगुआ तेली की पत्नी का रसूका राजा भोज की रानी के पास पहुंच गया और जब रानी ने रसूका देखा तो वह रानी के रसूके से अधिक कीमती था। उसमें हीरे मोती रानी के रसूके से अधिक जड़े थे।

रानी ने पूरी बात राजा भोज को बतायी और धोबी को दरबार में हाजिर होने के लिए बुलवाया गया। राजा भोज ने धोबी से रसूका के विषय में जानकारी चाही तो धोबी ने कहा कि वह गंगुआ तेली व आपके ही कपड़े धोता है और किसी के नहीं। राजा भोज ने गंगुआ तेली के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के लिए प्रति दिन महल में कडुआ तेल पहुंचाने के फरमान जारी कर दिये और कहा कि तेल चाहे तुम्हारी धर्मपत्नी ही क्यों न लाये लेकिन तेल भोजपुर में प्रति दिन आना चाहिए। अपने स्वाभिमान पर अड़े गंगुआतेली ने गौसपुर से गंगाइच तथा बिचपुरी तक एक नाली बनवायी। जो राजा के महल तक जाती थी। खुदाई करने पर आज भी तेल की चिकनाहट में लिपटी ईंटे मिलती हैं।

यह बात भी काफी विख्यात है कि राजा भोज ने इसके बाद अपने नाम से भोजपुर नाम का ग्राम गंगा के किनारे बसाया। पुरानी किवदंतियों के अनुसार राजा भोज को कुष्ठ रोग हो गया। तब एक साधु ने राजा को बताया कि वह गंगा में जहां बलका संगम हो वहां स्नान करने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है।

उस समय बघार नाले के स्थान पर बलका नदी बहा करती थी। यह भोजपुर स्थान बलका और गंगा का संगम स्थल है। बलका नदी (नाला बघार) आज भी भोजपुर के निकट बह रहा है। बलका मंदिर भी बघार भोजपुर के निकट स्थापित है। प्रति वर्ष भोजपुर में बलका संगम का मेला होता है। यहां पर बीमारी के कारण राजा भोज निवास करते थे। भोजपुर ग्राम में प्राचीन सामग्री बिखरी पड़ी है। भोज का किला आज भी ऊंची पहाड़ी पर खण्डहर के रूप में रह गया है। भोजपुर राजा का किला वर्तमान में खण्डहर और बीरान हो गया है।

तेरहवीं शताब्दी में बलवन ने एक मस्जिद व चौकी जनता की रक्षा हेतु भोजपुर के किले के अंदर बनवायी थी। टीले की मस्जिद पर एक पत्थर लगा था। जिस पर दो पैरों के निशान थे। कुछ लोग इसे बुद्ध और कुछ राजा भोज के पैरों के निशान बताते हैं।

राजा भोज ने ग्राम गढ़ पर बिचपुरी की सीमा में अपना महल बनवाया। रानी के लिए शेखपुर के लिए रानी का महल बनवाया। जिसको आज भी रानी का टीला कहा जाता है। रानी के टीले के पश्चिम में ग्राम अमानाबाद के पास रानी का तालाब बनवाया जिसको आज भी रानी का ताल कहा जाता है। जहां पर राजा भोज को जीवन दान की अनुभूति हुई थी। इसके पश्चिम में एक सागर ताल है जो पक्की ईंटों से पक्का बना है। इसे लोग सगरा ताल भी कहते हैं। खुदाई के समय आज भी पक्की काली मिट्टी से जुड़ी हुई दीवारें निकलती हैं।

ग्राम शेखपुर के दक्षिण की ओर नरायनपुर गढ़िया ग्राम है, जहंा एक बहुत बढ़ा टीला है, उसे आज भी गंगू तेली का टीला कहा जाता है। वहीं पर गंगू तेली का महल था। कई स्थानों पर गंगू तेली के तेल के कारखाने थे। वहीं स्थित ग्राम गौसपुर में एक पुराना देवी का मंदिर है। वह आज भी गंगुआ टीले के नाम से मशहूर है। यहां पर मूर्तियां बनती थी। जहां वर्तमान में अक्सर पत्थर की कतरन मिलती है।

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